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न्याय व्यवस्था में हलचल मचाने वाला वीडियो, CJI भी खुद को नहीं रोक पाए, बीच मीटिंग दिया ये आदेश

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Posted On:Wednesday, June 3, 2026

बिहार के वैशाली जिले की एक अदालत से न्याय प्रणाली की कछुआ चाल और कानून के कड़े रुख को बयां करने वाला एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। अदालत ने 34 साल पुराने एक आपराधिक मामले में फैसला सुनाते हुए 85 साल के एक बुजुर्ग को तीन साल की कैद की सजा सुनाई है। सजा पाने वाले इस बुजुर्ग का नाम दीपा राय है, जिन्होंने अपनी जवानी के दिनों में एक अपराध किया था, लेकिन उसका अंतिम फैसला आते-आते वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव (बुढ़ापे) पर पहुंच गए हैं।

वैशाली के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने दीपा राय को आर्म्स एक्ट (Arms Act) के तहत दोषी करार देते हुए यह सजा सुनाई। यह पूरा मामला साल 1992 का है। अदालत ने इस मामले में दीपा राय के अलावा चार अन्य अभियुक्तों को भी दोषी पाया, जिन्हें कोर्ट ने 10-10 साल की कड़ी जेल और 25-25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। हालांकि, दीपा राय की अत्यधिक उम्र और उनके गिरते स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उन्हें बाद में अंतरिम जमानत (Interim Bail) दे दी।

इस मामले की सबसे भावुक कर देने वाली तस्वीर तब सामने आई जब बुजुर्ग दीपा राय को सजा के एलान के लिए कोर्ट रूम में पेश किया गया। कोर्ट परिसर में उन्हें देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। दीपा राय की शारीरिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वे अपने पैरों पर ठीक से खड़े होने या चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं। उनके परिजनों ने उन्हें दोनों तरफ से सहारा देकर किसी तरह कोर्ट रूम तक पहुंचाया।

इस पूरी घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। यह वीडियो देश की न्याय व्यवस्था में मुकदमों के निपटारे में होने वाली भारी देरी पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तक पहुंचा मामला

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बुजुर्ग को इस हालत में कोर्ट ले जाए जाने का वीडियो देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तक भी पहुंच गया। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने तक की नौबत आ गई थी।

जिस समय यह खबर और वीडियो चीफ जस्टिस के पास पहुंची, उस समय वे देश के दो अन्य वरिष्ठ जजों के साथ हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक कर रहे थे। 34 साल बाद आया यह फैसला एक तरफ जहां यह संदेश देता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और अपराध कभी छिपता नहीं, वहीं दूसरी तरफ यह भारतीय अदालतों में लंबित पड़े लाखों मामलों और न्याय में होने वाली देरी की दर्दनाक हकीकत को भी उजागर करता है।


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